पृष्ठभूमि / बस्तर के पत्रकार साथियों से साभार // सभी फोटो श्री सुनील पांडेय //
तेंदूपत्ता बस्तर के वनवासियों के लिए ‘हरा सोना’ है। हर गर्मी में 3 महीने तक वन अमला संग्रहण-भंडारण में जुटता है। सरकार इसे प्राथमिकता से खरीदती है, समर्थन मूल्य बढ़ाया गया और समय पर भुगतान का दावा करती है। उद्देश्य साफ था – निजी खरीदी में शोषण रोकना और नक्सली लेवी पर लगाम लगाना। बीते 5 साल में बस्तर के अंदरूनी इलाकों में नक्सलियों के लिए तेंदूपत्ता सबसे बड़ा लेवी-स्रोत बना रहा। ठेकेदारों-वनोपज कारोबार में उनका हिस्सा तय था। जंगल में रहने वाले मासूम आदिवासियों की आय का बड़ा हिस्सा बंदूक की नोक पर चला जाता था।
आग क्यों लगती है? – 5 बड़े कारण
- नक्सली साजिश: सरकारी खरीद से लेवी बंद हुई। कई बार ठेकेदारों को डराने या सरकारी व्यवस्था को फेल दिखाने के लिए नक्सली खुद फड़ों-गोदामों में आग लगाते हैं। कांकेर में 6 केंद्रों पर आगजनी इसका उदाहरण है।
- भंडारण की लापरवाही: पुराना स्टॉक सालों तक गोदाम में पड़ा रहता है। गुणवत्ता गिरती है, नीलामी नहीं होती। तेंदूपत्ता अत्यधिक ज्वलनशील है। गर्मी 45°C पार होते ही खुद सुलगने लगता है। बीजापुर में 18 हजार बोरे ऐसे ही राख हुए।
- शॉर्ट सर्किट और मानवीय चूक: गोदाम अस्थायी टीन शेड में, बिजली तार ऊपर से गुजरते हैं। मोहला में ट्रक पर तार गिरने से 10 लाख का माल जला। बीड़ी-सिगरेट की चिंगारी भी बड़ी वजह है।
- भ्रष्टाचार छिपाने की आग: सुकमा में 7 करोड़ गबन सामने आया। जांच से बचने के लिए रिकॉर्ड समेत गोदाम जलाने के आरोप लगते रहे हैं। डीएफओ-प्रबंधकों की गिरफ्तारी के बाद यह एंगल और मजबूत हुआ।
- सुरक्षा मानक शून्य: फायर-सेफ्टी उपकरण नहीं, रेत-बाल्टी तक नहीं। गोदाम रिहायशी इलाके से दूर, फायर ब्रिगेड पहुंचने तक सब स्वाहा।
नुकसान क्यों होता है?
- आर्थिक: बीजापुर में एक झटके में 10 करोड़ का पत्ता + 3 करोड़ का गोदाम खाक। यह पैसा सीधे 15 लाख संग्राहकों की मजदूरी था।
- सामाजिक: आदिवासी की गर्मी की अतिरिक्त आय मारी जाती है। लेवी न देने पर नक्सली हिंसा, देने पर पुलिस-सरकार की कार्रवाई – वह दो पाटों में पिसता है।
- प्रशासनिक: लॉकडाउन से अब तक 2 मंडल अधिकारी दोषी पाए गए। जांच-जेल-पूछताछ लंबी, पर सिस्टम नहीं सुधरता।
समाधान का रास्ता
- 15 दिन में नीलामी अनिवार्य कर पुराना स्टॉक जीरो किया जाए।
- हर गोदाम में CCTV, फायर अलार्म, पानी टैंक जरूरी।
- बीमा कवर बढ़ाया जाए – अभी नुकसान की भरपाई संग्राहक को नहीं मिलती।
- नक्सल प्रभावित फड़ों की सुरक्षा CRPF को दी जाए।
- गबन रोकने को भुगतान 7 दिन में DBT + SMS अलर्ट, जैसा CM ने कहा।
हरा सोना अगर राख बनता रहा तो बस्तर का वनवासी और सरकार दोनों का नुकसान है। आग सिर्फ पत्ते नहीं, भरोसा भी जलाती है।
बस्तर में ‘हरा सोना’ तेंदूपत्ता – आर्थिक उन्नति का जरिया
तेंदूपत्ता बस्तर के वनवासियों की गर्मी के 3 महीने की सबसे बड़ी नकद आय है। इसे ‘हरा सोना’ इसलिए कहते हैं क्योंकि अप्रैल-जून में जब खेती नहीं होती, तब यही परिवार चलाता है।
आर्थिक सहयोग कैसे बनता है:
- सीधी मजदूरी: सरकार हर साल समर्थन मूल्य तय करती है। 2025 में 5500 रु. प्रति मानक बोरा दर है। एक परिवार 15-20 दिन में 1000-1200 गड्डी तोड़कर 8-10 हजार रु. कमा लेता है। बस्तर में 15 लाख से ज्यादा संग्राहक हैं।
- बोनस और लाभांश: संग्रहण के बाद बचे लाभ से समितियां बोनस देती हैं। 2021-22 में 7.85 करोड़ बांटना था। यह अतिरिक्त आय बच्चों की फीस, शादी, बीमारी में काम आती है।
- स्थानीय रोजगार: तड़ाई, सुखाई, छंटाई, बोरा भराई, परिवहन में गांव के मजदूर-युवाओं को काम मिलता है। फड़ मुंशी, प्रबंधक जैसे पदों से भी आय होती है।
- महिलाओं की आत्मनिर्भरता: 70% संग्रहण महिलाएं करती हैं। पैसा सीधे बैंक खाते में आता है, जिससे वे घर के फैसलों में भागीदार बनती हैं।
- लेवी से मुक्ति: सरकारी खरीद और DBT भुगतान से बिचौलिए-नक्सली लेवी घटी, पूरा पैसा संग्राहक को मिला।
इस तरह तेंदूपत्ता बस्तर के वनवासियों के लिए संकट के समय का ‘ATM’ है, जो पलायन रोकता है और कुपोषण-गरीबी से लड़ने की ताकत देता है।
पुनः बस्तर के सभी पत्रकार साथियों से साभार // सभी फोटो श्री सुनील पांडेय //